धर्मनगरी में लगने वाले कुंभ मेले 1867 तक सामाजिक संस्थाओं के सहयोग से ही संपन्न कराए जाते थे।

1867 में उमड़ी श्रद्धालुओं के सैलाब को देखकर ब्रिटिश सरकार पहली बार चिंतित नजर आई। परिणामस्वरूप अंग्रेजों ने कुंभ के तत्काल बाद हरिद्वार के इतिहास की पहली डेवलपमेंट कमेटी गठित की।

कमेटी का अधिकांश दायित्व तत्कालीन पुरोहितों और कुछ महंतों को सौंपा गया। यही कमेटी हरिद्वार के प्रबंध के लिए नगरपालिका के गठन का माध्यम बनीं। नगरपालिका की स्थापना 1867 के कुंभ के बाद वर्ष 1868 में कर दी गई।

नगरपालिका के आरंभिक कार्य तीर्थयात्रियों की आने वाली भीड़ के लिए प्रबंध करने तक सीमित रखे गए। बाद में इसके कार्यों का विस्तार होता रहा। 1879 के कुंभ में फिर से भारी भीड़ हरिद्वार आई। सरकार ने हरिद्वार को रेलमार्ग से जोड़ने का काम प्रारंभ किया। यह काम इतनी तेजी से चला कि 1885 तक हरिद्वार रेलमार्ग से जुड़ गया।
 
बदरी- केदार यात्रा भी पैदल हुआ करती थी:
बाद में 1891 में हरिद्वार-देहरादून रेलमार्ग और 1926 में हरिद्वार-ऋषिकेश रेलमार्ग बनकर तैयार हुआ। कुंभ पर आने वाली भीड़ के प्रबंधन में रेलवे ने योगदान दिया। देश के तमाम शहरों से यात्रियों को कुंभ नगर लाया जाना था। इसलिए भविष्य का आंकलन कर अंग्रेजों ने लक्सर को रेलवे जंक्शन के रूप में विकसित किया।

हरिद्वार शहर के साथ-साथ उत्तर में मोतीचूर और दक्षिण में ज्वालापुर में भी रेलवे स्टेशन बनाए गए। रेल लाइन आने से पहले कुंभ नहाने के लिए श्रद्धालु बैलगाड़ियों और घोड़ों पर सवार होकर कुंभ स्नान करने आते थे। अंग्रेज यात्री और सर्वेयर कनिंघम ने तो यहां तक लिखा है कि हरिद्वार कुंभ में पहुंचने वाली अधिकांश भीड़ पैदल ही आया करती। उन दिनों बदरी- केदार यात्रा भी पैदल हुआ करती थी।

पहले रेल और बाद में बसों ने कुंभ मेलों की भीड़ को और बढ़ा दिया। भीड़ की लगातार बढ़ती संख्या के कारण ही कुंभ मेला नगरपालिका की सीमाओं के बाहर भी फैलाया जाता रहा। हालांकि आज भी कुंभ मेले के तमाम मुख्य आयोजन नगर निगम की सीमाओं में ही बंधे हुए हैं।

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